उत्तराखंड

खिर्सू का कठबद्दी मेला। बद्दी समाज का वह इतिहास जो अपनी जान गंवाकर बचाता था लाखों लोगों की जान।

 

कुलदीप रावत:

 

 

उत्तराखंड के पौड़ी जिले के खिर्सू में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां पर बद्दी मेले का आयोजन होता है। माना जाता है कि इस परंपरा को निभाने से क्षेत्र में उन्नति रहेगी और किसी भी तरह की आपदा से गांव वासी दूर रहेंगे।

 

काठ के घोड़े पर एक छेद कर उसके आर पार एक रस्सा पर टांगा

इस अनोखी परंपरा को निभाने के लिए जिसमें काठ के एक घोड़े पर बीचों बीच एक छेद कर उसके आर पार एक रस्सा पर टांगा जाता था। फिर ऊंची जगह से उस पर बेडा या बद्दी जाति के पुरुष को बिठा कर छोड़ा जाता था। काठ का घोड़ा अपने सवार समेत सरपट नीचे को आता था, जिसमे कभी कभी व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती थी। हालांकि अब इसमें मनुष्य की जगह लकड़ी का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इस तरह की परंपरा को गांववासी अभी भी आगे बढ़ा रहे हैं।

क्या यह समाज इतना निरंकुश था कि एक गरीब को एक 10 इंच मोटी व 400 मीटर लम्बी रस्सी में एक काठ की घोड़ी में बिठाकर उसके दोनों पांवों में मिट्टी या रेत के 450 ग्राम के थैले बांधकर एक गरारी के माध्यम से ऊंची चोटी से नीचे आबाद खेतों या गांव तक फिसलने को मजबूर करता था व अगर वह फिसल कर सुरक्षित बच भी जाय तो उसे मार दिया जाता था या गिरकर घायल हो जाये तब भी मार दिया जाता था! क्योंकि उसके ऐसा करने से क्षेत्र की समस्त आपदाएं टल जाती थी जैसे अतिवृष्टि होना, ओलों से फसल चौपट होना, अत्याधिक हिमपात होना, अकाल पड़ना, महामारी आना, खेतों में खड़े अन्न की बालों में अन्न न आना, भंडारण अन्न को चूहों द्वारा नुकसान पहुंचाना, बाघ, भालू, बंदरों व जंगली सुअरों द्वारा गांव -गांव घर घर आतंक मचाना, हल जोतते समय हल की फाल पर सिर्फ लिपटना, अत्याधिक सर्पों का निकलना, गाय के स्तन से खून निकलना, पशुधन की हानि होना। भूकम्प से भयंकर तबाही मचना, नदियों में बाड़ आना व उपजाऊ जमीन बहना। जनधन, मानव हानि होना, देवदोष लगना। परियों द्वारा उत्पात मचाना इत्यादि।

इस सबसे हमारे समाज को मुक्ति दिलाने वाली एक जाति गन्दर्भ इस देवभूमि में आदिकाल से निवास करती रही है। आदिपर्व {69/28} में इस जाति का हिमालयी क्षेत्र में निवास बताया जाता रहा है व इस जाति के मानुषों की संख्या तब 88000 के लगभग आंकी गयी। गन्दर्भ शिबभक्त हुआ करते हैं जो मध्य हिमालय में निवास करते हैं व नाच गाकर अपना जीवन यापन करते हैं। गढवाल हिमालय में इन्हें साक्षात शिब इसलिए माना गया है क्योंकि जब-जब भी समाज पर विपत्ति पड़ी इस समाज ने अपना बलिदान देकर सम्पूर्ण समाज की रक्षा की।

यह समाज जो आदिकाल में मध्य हिमालयी क्षेत्र में 88 हजार की संख्या से भी अधिक हुआ था, वर्तमान में हम सबके बीच लोप हो गया। ब्रिटिश काल में अकेले ब्रिटिश गढवाल में इस समाज के 50 से अधिक बड़े गांव हुआ करते थे जो धीरे-धीरे मिटते चले गए।

खिर्सू के बद्दी मेले का जिक्र 1808 में वेडबर्त का पहला प्रत्यक्षदर्शी अंग्रेज कैप्टेन रेपर का वृतांत सामने आता है जिसे ट्रेल द्वारा अपनी पुस्तक {TRAIL 1828:224-25:TURNER 1933:554-55} व इतिहासकार महेश्वर प्रसाद जोशी द्वारा अपनी पुस्तक “शूद्रों का ब्राह्मणत्व मध्य हिमालय अनुभव {अध्याय 6 पृष्ठ 48 से 57} में वर्णित किया है।

कैप्टेन रेफर ने बर्त या बेडबर्त का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उन्होंने मई माह 1808 में गढवाल श्रीनगर के अलकनंदा नदी पार इसे आयोजित होते स्वयं देखा है। उनके अनुसार अलकनंदा तट से पहाड़ की चोटी तक एक रस्सी बांधी गयी और “नट” (बद्दी/बेड़ा) जाति का व्यक्ति लकड़ी के मंच पर बैठकर सरकते हुए नीचे आया।

बेडबर्त या बेदबर्त का कैप्टेन रेपर से अधिक स्पष्ट वर्णन “ट्रेल” के समय आया। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने लिखा कि मध्य हिमालय के 50 गांवों में तब यह मेला आयोजित किया जाता था। जिसमें गहड़ व कोठगी गांव भी सम्मिलित थे जो खिर्सू फारेस्ट बंगले के नीचे अवस्थित थे। ट्रेल के अनुसार जो गांव महादेव के संरक्षण में होते थे वहीं ये मेले आयोजित होते थे।

ट्रेल व एमपी जोशी लिखते हैं कि प्रत्येक जनपद के अपने वंशानुगत बादी हुआ क़रता था व उन्हें पूरी छूट हुआ करती थी कि वे किसी भी इलाके में जाकर नाच-गाना करके अपने जीवन यापन हेतु धनोपार्जन कर सकें। ट्रेल के संज्ञान में सबसे लंबी रस्सी 2100 हाथ लम्बी थी व उसकी मोटाई 20 इंच। जिसे एक मील दूर पहाडी पर खींचकर ले जाने हेतु 80 से 100 आदमी लगे। एमपी जोशी लिखते हैं कि प्रचलित विश्वास के अनुसार बेदबर्त करने वाला बद्दी/बादी यदि गंतव्य तक पहुँचने से पहले गिर जाता तो उसे अशुभ माना जाता और यदि गिरने के बाद जीवित बच जाता तो उसे इसलिए मार दिया जाता था ताकि देवता का प्रकोप न लगे। ब्रिटिश काल में ऐसी जघन्य हत्याओं पर सख्ती के साथ रोक लगा दी ट्रेल लिखते हैं कि 1815 यानि ब्रिटिश राज के बाद ऐसी कोई घटना सामने नहीं आई।

खिर्सू के बेडबर्त की जगह कठबद्दी मेले को 150 बर्ष पुराना बताया जाता है जो तर्क संगत नहीं लगता क्योंकि आज भी कई लोग उदाहरण देते हैं कि उन्होंने अभी 60 साल पूर्व तक बेडबर्त मेला आयोजित होते खिर्सू व कोठगी में देखा है जिसमें बद्दी समाज के लोग स्वयं बबूल की रस्सी पर फिसलते हुए आते थे। एक आध दुर्घटना का भी वे लोग जिक्र करते हुए कहते हैं जब बद्दी घायल होकर रस्सी से गिर गए लेकिन एक घटना के बाद इस मेले को तब प्रतिबंधित कर दिया गया जब बेडबर्त की रस्सी पर फिसलते बद्दी समाज के व्यक्ति को परियां उड़ाकर अपने साथ ले गई व यह लोगों ने अपनी खुली आँखों से देखा। लोगों का मानना है कि उन्होंने अपने काल में किसी भी “बेडबर्ती” बादी समाज को लोगों द्वारा मारते हुए नहीं देखा। हां इतना जरूर था कि उस दिन से वह व्यक्ति अपने बाल मुंडवा देता था, कृपाण व कंघी नहीं रख सकता था व उसका समाज में बड़ा मान सम्मान होता था। उसे बद्दी के स्थान पर “बेडबर्ती या बेदबर्ती” पुकारा जाता था जो एक बड़ा सम्मान कहा जाता था व उसके समाज में वह साक्षात शिब अवतार माना जाता था।

शिब अवतार के पीछे अल्मोड़ा के “बंचु” नामक बद्दी का नाम प्रसिद्ध है। जिसका जिक्र मोरक्राफ्ट व ट्रेबेक ने अपनी पुस्तक में किया है। वे बताते हैं कि 1820 में एशियाई देशों में कोलरा (हैजा) नामक बीमारी से 5 करोड़ लोगों की मौत हुई। यह हैजा साल दर साल यूंही महामारी का रूप धारण करती रही। ब्रिटिश काल में अल्मोड़ा में भी इस हैजा का प्रकोप बड़ा तब वहां के राजघराने के लोगों व प्रतिष्ठित घराने के लोगों ने ब्रिटिश प्रशासन से बेडबर्त करवाने की बात कही। इस महामारी से बचने का कोई उपाय न सूझने पर ब्रिटिश सरकार ने इसकी अनुमति दे दी व “बंचु” नाम बद्दी ने बेडबर्त किया जिससे सचमुच अल्मोड़ा शहर ही नहीं बल्कि कुमाऊं क्षेत्र को हैजा से मुक्ति मिल गयी। “बंचु” ने लगातार 16 बार बेडबर्त करके रिकॉर्ड बनाया व खूब प्रसिद्धि पाई।

वही “खिर्सू के बौडिंग” अर्थात ब्रिटिश बंगले में कठबद्दी मेला आयोजन के बारे में मैंने बचपन में अपने गांव के सुभागी लाल, बलवंत सिंह बिष्ट, जोध सिंह नेगी व स्वयं अपने पिताजी चक्रधर प्रसाद इष्टवाल से सुना है कि जिस बद्दी को परियां हर कर ले गयी थी उसका नाम “कठ्या या कंठया” बद्दी था।

जिस तरह गहड़ गांव व कोठगी या फिर खिर्सू-चौबट्टा के लोगों का मानना है कि यह मेला लगभग 152 साल पुराना है तो इससे हिसाब लगाया जा सकता है कि यह घटना ब्रिटिश काल की ही होगी लेकिन इसका जिक्र तब इसलिये कहीं दर्ज नहीं हो पाया होगा क्योंकि तब गढवाल कमिश्नरी नहीं बनी थी बल्कि 1940 तक पौड़ी में सह आयुक्त बैठा करते थे। 1969 में गढवाल कमिश्नरी विकसित हुई। मुझे लगता है कि गढवाल गजेटियर की विस्तृत छानबीन की जाय तो हमें उस सन का सन्दर्भ मिल सकता है जिस सन में कंठया बद्दी को परियां अपने साथ आसमान में उड़ाकर ले गयी थी।

अब कंठया या कठया बद्दी का वृतांत क्यो न हम कठबद्दी से जोड़कर देखें क्योंकि हमारे समाज के अपभ्रंश शब्द कहीं न कहीं हमें उन सन्दर्भों की ओर इंगित करते हैं जो भूतकाल के गर्भ में छुपे होते हैं।

क्यों बर्षों बाद शुरु हुआ कठबद्दी मेला।

क्षेत्रीय ग्रामीण बताते हैं कि जब परियों द्वारा कंठया बद्दी को हर ले जाने की घटना हुई तो लोगों ने इसे देवदोष मान लिया और सोचा उनका घँडियाल देवता उन पर नाराज हो गया। कोई भी बद्दी समाज का व्यक्ति तो दूर गांव के व्यक्ति भी इस मेले के आयोजन के बारे में नहीं सोचता। पूरे पांच साल मेला न होने से खड़ी फसलें ओलाबृष्टि से तबाह होने लगी। जंगलों में आये दिन भयंकर आग लगने लगी। भेड़ बकरियों का आये दिन बाघ मारने लगे। दिन दहाड़े भालू सुअर व बाघ बंदर गांव व उसके आस पास दिखने लगे। पशुधन का नाश होने लगा। उपजाऊ खेत बंजरों में तब्दील होने लगे। भुखमरी फैलने लगी। बच्चे जन्म लेते ही मरने लगे। ओलावृष्टि व भूकम्प डराने लगा। ऐसे में फिर ग्रामीणों को सूझा कि कहीं यह देवता का प्रकोप तो नहीं।

गणत व पूछ की तो पता चला कि यह सब दोष बन परियों व घँडियाल का है क्योंकि क्षेत्र वासियों ने मेला जुटाना छोड़ दिया है। मेला कैसे आयोजित हो इसकी युक्ति हेतु गहड़ व कोठगी गांव के थोकदार विद्वान पंडितों की शरण में गए जिन्होने उन्हें युक्ति सुझाई कि क्यों हम किसी की जान को दांव पर लगाएं इसलिये जैसे हम मूर्ति स्थापना से पूर्व मंत्रोच्चारण द्वारा किसी भी मूर्ति में प्राण फूंककर उसे साक्षात जीवित प्रतीक मानकर उसकी पूजा करते हैं वैसे ही हम कृत्रिम बद्दी बनाकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करके विधिवत इस मेले का आयोजन कर सकते हैं। बस इतना करना होगा कि कोठगी वे गहड़ ग्रामवासियो को अपने अपने गांव में मंडाण लगाकर अपने देवता के पश्वा झुलाने होंगें। दोनो गांवमें मंडाण लगाए गए। घँडियाल के पश्वा अवतरित हुए। वन परियों के पश्वा भी उतरे। ग्रामीणों ने मेला आयोजन की आज्ञा मांगी तो उन्हें आज्ञा मिल गयी व बारी बारी साल दर साल कभी गहड़ व कभी कोठगी में मेले आयोजित होने लगे जिसकी व्यापकता घँडियाल देवता मन्दिर खिर्सू में हर बर्ष दिखने को मिलती है। तब से यह मेला निरंतर चलता आ रहा है।

कब से प्रारम्भ हुआ यह मेला।

इस मेले की जानकारी 1808 में कैप्टन रेपर ने सबसे पहले ऑन रिकॉर्ड साझा की । यह मेला तो उससे पूर्व भी सैकड़ों सालों से आयोजित होता रहा है लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि के हिसाब से अगर हम लिखित दस्तावेज की बाद करें तो 3 मई 2024 को यह मेला 216 साल पूरे कर चुका है।

 

साभार

फोटोग्राफ संजू रावत की फेसबुक वॉल से

 

हिमालय डिस्कवर

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